✦ संदीप कुमार की काव्य-दुनिया में आपका स्वागत है
kumar Vairagi
सबकुछ तो सबको नहीं मिलता,
एक काश सभी का रह जाता है।
✦ विशेष कविता
✦ काव्य संग्रह
वैराग्य · काश
यह मेरा है। वह मेरा होता, मैं यूँ हँसता। उलझी सुलझी ज़िंदगी की कड़ियों में कुछ रिश्तों का विश्वास अधूरा रह जाता है। सबकुछ तो सबको नहीं मिलता…
भक्ति · बुद्ध · विरह
हुई दुविधा बड़ी, आई बिछड़न की घड़ी! नवजन्मित बालक को, गोदी में लेकर रात खड़ी, चित विचलित है भीतर ही भीतर कि कहूँ कि कुछ ना जाऊँ कहकर…
समाज · विद्रोह · मानवता
ब्राह्मण क्षत्रिय शूद्र वैश्य वर्गों में बँटी है मानवता नस्ल बिरादरी तर्ज तरीकों की बेड़ियों में बँधी है मनुष्यता — लहू है लाल सबका फिर लाली की बिसात क्या पूछते हो…
जीवन · भटकन · उम्मीद
मैं शहर छानता, कमरे बदलता, मैं भागता, ताकता, सड़कें बदलता — सड़कें आसमान तक जाने नहीं देतीं, ये थमती हैं मीनारों तक…
नारी शक्ति · विद्रोह · समाज
जगत जननी नशे में झूम रही, जन्मानुष वहशी बन घूम रही — ओ नारी! चंदन बिंदी से ऊपर उठकर अपनी सुंदरता पहचानो…
प्रेम · स्मृति · त्योहार
जब याद करोगे तुम मुझे, कहीं तुम में ही मिल जाऊँगा। सब होली साथ मना लेना, मैं रंगों में दिख जाऊँगा…
समय · जीवन · व्यवस्था
आ वक़्त! रुक ज़रा, मैं भी आता हूँ — दो कदम साथ चलें, कुछ तुम कहो, कुछ हम अपनी कहें… बस मिट जाए ये रोटी की तलब।
आत्म-चिंतन · दर्शन
आज एक घड़ी, खुद को पहचान लूँ, वक़्त की बदलती राहों को थोड़ा जान लूँ — सुनसान-सा शहर, और उजाड़-सी राहें, मैं भी इसी का हिस्सा हूँ…
समाज · वेदना · राष्ट्र
तितर-बितर बिखरा हुआ कैसा ये जहान है, जिस गली में कभी शोर था, वो हर गली सुनसान है — लेशमात्र सा बचा हुआ, ये मेरा कैसा हिंदुस्तान है।
बचपन · स्मृति · माँ
वो भी क्या दिन थे, जब ढोल-नगाड़े बजते थे मेरे गाँव में, वो भी क्या दिन थे, जब सोता था मैं नीम की ठंडी छाँव में — कहीं मिल जाए... वो मेरा बचपन, शायद कहीं मिल जाए।
प्रेम · शिकायत · समर्पण
तुझे सोचा, तुझे माँगा, तुझे चाहा, तुझे पाया, तुझसे रूठा, तुझे मनाया, तुझे हँसाया, तुझे सताया — इतना किया, और क्या-क्या करता। और तू कहती है, मैं प्यार नहीं करता।।
आत्म-चिंतन · जीवन · प्रेम
तेरा जन्मदिन है, तुझे क्या आज दूँ — मैं हूँ जर्जर! यूँ ठहरा फकीरों-सा, हूँ खुद कौड़ियों-सा, तुझे क्या धनराज दूँ। तेरा जन्मदिन है मेरी ज़िंदगी, तुझे क्या आज दूँ।।
विरह · प्रेम · स्मृति
क्या उसे मेरी याद आती होगी? जो हासिल है, क्या उसमें मुझे ढूँढ पाती होगी? मानता हूँ, आज दीदार नहीं है तेरा, और न ही कोई गुफ़्तगू…
आत्म-चिंतन · वेदना · दर्शन
आज मैंने अपने दिल को जलते देखा है, कठोर-से हृदय में एक मोम-सा पिघलता देखा है — पर आज एक कोने में, गले मिलते मैंने, खुद को खुद से देखा है।
माँ · बाप · समाज · प्रेम
मैं चाँद देखता हूँ, मुझे माँ दिखता है। मैं चाँद देखता हूँ, मुझे बाप दिखता है। मैं चाँद देखता हूँ, मुझे समाज दिखता है। मैं चाँद देखता हूँ, मुझे महबूब दिखता है।
✦ पहली रचना · आशा · जीवन
सागर में तूफ़ान आना तो है, हँस के मगर पार जाना तो है। दिल में हों शिकवे, मगर मुस्कुरा — रिसते को आख़िर निभाना तो है।
✦ काव्य संग्रह
यह संग्रह एक गहरे सफ़र का साक्षात्कार है। इसके पृष्ठों में आपको भावनाओं का एक विस्तृत वायरस पाया जाएगा — जो जीत की हर्ष की उच्छाटन से लेकर हार के विलाप तक है।
मेरे शब्दों के माध्यम से, मैं हमारे साझा मानव अनुभव की सार्वभौमिक आभा — उच्चारण और निम्नार्थ, खुशियों और दुखों, विजयों और पराजयों — को प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ।
✦ कवि का परिचय
kumar Vairagi
संदीप कुमार
नमस्ते दोस्तों, मैं संदीप कुमार हूँ, और मुझे खुशी है कि मैं खुद को एक कवि के रूप में और अधिक बता सकता हूँ।
मेरी कविताओं के माध्यम से, मैं मानव भावनाओं और अनुभवों के जटिल पहलुओं की खोज पर निकलता हूँ। हर पंक्ति जो मैं रचता हूँ, वह मेरे जीवन और मानव मन की गहराई का एक परिचय है।
एक कवि के रूप में, मुझे शब्दों की परिवर्तनात्मक शक्ति में विश्वास है। मैं हृदयों को स्पर्श करने, विचारों को उत्तेजित करने, और अपनी पंक्तियों के माध्यम से भावनाओं को प्रेरित करने की कोशिश करता हूँ।
मैं आप सभी को इस काव्यात्मक अयान में साथ जाने के लिए आमंत्रित करता हूँ। चलिए "वैरागी" के पृष्ठों के माध्यम से हमारे आत्मों के गहराई को अन्वेषित करें।
✦ जुड़े रहें
हर हफ़्ते एक नई कविता — सीधे आपके inbox में।
बस शब्द, कोई शोर नहीं।